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Showing posts from July, 2026

सभी की आँखें खोलने के लिए ये संदेश है...

      सभी की आँखें खोलने के लिए ये संदेश है...   जो मंदिर/गुरुद्वारा/धार्मिक स्थलों से लंगर को अपने घर बांध बांध कर ले जाते हैं... एक बार गुरु नानक देव जी एक नगर को गए। वहाँ सारे नगर वासी इकठे हो गए। वहाँ एक महिला भक्त श्री गुरु नानक देव जी से कहने लगी- महाराज! मैंने तो सुना है, आप सभी के दुःख दूर करते हो। मेरे भी दुःख दूर करो, मैं बहुत दुखी हूँ। मैं तो आप के गुरुद्वारे में रोज 50 रोटी अपने घर से बना कर बाँटती हूँ, फिर भी दुखी हूँ। ऐसा क्यों ? गुरु नानक देव जी ने कहा- कि तू दुसरों का दुःख अपने घर लाती हो, इस लिए दुखी हो। वो कहने लगी - महाराज! मुझे कुछ समझ नहीं आया, मुझ अज्ञानी को ज्ञान दो। गुरु नानक देव जी कहने लगे- तूं 50 रोटी गुरु द्वारे में बांटती तो हो... पर बदले में क्या ले जाती हो ? वो कहने लगी- सिर्फ आप के लंगर के सिवा और कुछ भी नहीं। (लंगर में बंट रही प्रसाद)  गुरु नानक देव जी कहने लगे- लंगर का मतलब है एक रोटी खाना ओर अपने गुरु का शुकर मनाना। पर तूं तो रोज बड़ी-बड़ी थैलियों में दाल मखनी , मटर पनीर, रायता, खीर और 10-15 रोटी भर-भर के ले जाती हो। तीन दिन वो ल...

सच्ची मानवता

                          सच्ची मानवता भाई .... मैंने तुम्हें कल सुबह जो थैलियां दी थी वो...  हां हां बाबा ....सिलाई कर दी मैंने जैसे आपने कहा था, रुकिए देता हूं कहकर मोहन दर्जी जो सड़क किनारे एक खाली जगह पर छायादार वृक्ष के नीचे बैठकर कपड़े सिलकर अपने परिवार का भरण पोषण करता था बोला... वाह .... बहुत सुंदर सिला है बेटा ....  देखकर बहुत अच्छा लग रहा है । मोहन बोला... बाबूजी ....एक बात पूछूं ... हां हां क्यों नहीं पूछो बेटा  आप इतने बड़े घर में रहते हैं मैं आपके बच्चों को भी जानता हूं मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर आप ने ये किसलिए सिलवाई हैं, ये थैलीयां तो आटे की है आपके कहने पर मैंने मजबूत भी सिल दी मगर समझ नहीं आया आपके घर में इसका क्या उपयोग होगा?? बेटा वो जो वहां फुटपाथ पर वृद्ध  बैठती है ना ये उनके लिए है मुझे उन्हें देनी है दरअसल बेटा बाहर इतनी गर्मी और धूप पड़ती है और उनका भी कोई नहीं है वह वहां बैठकर मेहनत करते हुए किसी रेहड़ी वाले के फल आदि बेचती है ताकि उनके दिन रात खाने का प्रबन्ध हो सके मैंने...

आइए हनुमंत जी बिराजिए

                  आइए हनुमंत जी बिराजिए एक साधु महाराज श्रीरामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते।  साधु महाराज का नियम था, रोज कथा शुरू करने से पहले "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे। एक वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते।  वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई। उन्हें लगा कि महाराज रोज "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहते हैं, तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे ? अत: वकील साहब ने महात्मा जी से पूछ ही डाला! महाराज जी आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं, हमें बड़ा रस आता है, परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उस पर हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं क्या? साधु महाराज ने कहा: हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है, कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं। वकील ने कहा: महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी, हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए। आपको साबित करके दिखाना चाहिए, कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं। महाराज जी ने बहुत समझाया, कि भैया आस्था को किसी सब...

बूढ़े पिता का दर्द

                    बूढ़े पिता का दर्द राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के एक छोटे से गाँव में रामनारायण नाम का एक बुज़ुर्ग व्यक्ति रहता था। उसका जीवन बहुत संघर्षों से भरा रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा संतोष और स्नेह झलकता था। गाँव के लोग उसे बहुत सम्मान देते थे, क्योंकि वह ईमानदार और सरल स्वभाव का इंसान था। उसकी पत्नी का देहांत कई साल पहले हो चुका था, और उसका एक ही बेटा था—मोहन—जिसे उसने अपनी पूरी मेहनत और प्यार से बड़ा किया था। सालों पहले की बात थी, जब रामनारायण और उसकी पत्नी की कोई संतान नहीं थी। दोनों बहुत दुखी रहते थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। एक दिन वे बीकानेर शहर के एक अनाथालय गए और वहाँ से एक छोटे से मासूम बच्चे को गोद लिया। उसी बच्चे का नाम उन्होंने मोहन रखा। उस दिन से उनकी दुनिया बदल गई। रामनारायण ने खेतों में दिन-रात मेहनत की, ताकि मोहन को अच्छी पढ़ाई मिल सके और उसका भविष्य उज्ज्वल बने। समय बीतता गया, मोहन बड़ा हुआ, पढ़-लिखकर शहर में नौकरी करने लगा और कुछ साल बाद उसकी शादी भी हो गई। शुरू-शुरू में सब ठीक चलता रहा, लेकिन धी...

हमारा एक-एक श्वास चन्दन का वृक्ष है

       हमारा एक-एक श्वास चन्दन का वृक्ष है सुनसान जंगल में एक लकड़हारे से पानी पीकर प्रसन्न हुआ राजा कहने लगा―"हे पानी पिलाने वाले ! किसी दिन मेरी राजधानी में अवश्य आना, मैं तुम्हें पुरस्कार दूँगा।" लकड़हारे ने कहा―बहुत अच्छा।       लकड़हारा एक दिन चलता-फिरता राजधानी में जा पहुँचा और राजा के पास जाकर कहने लगा―"मैं वही लकड़हारा हूँ, जिसने आपको पानी पिलाया था।" राजा ने उसे देखा और अत्यन्त प्रसन्नता से अपने पास बिठाकर सोचने लगा कि "इस निर्धन का दुःख कैसे दूर करुँ?" अन्ततः उसने सोच-विचार के पश्चात् चन्दन का एक विशाल उद्यान बाग उसको सौंप दिया। लकड़हारा भी मन में प्रसन्न हो गया। चलो अच्छा हुआ। इस बाग के वृक्षों के कोयले खूब होंगे। जीवन कट जाएगा।        यह सोचकर लकड़हारा प्रतिदिन चन्दन काट-काटकर कोयले बनाने लगा और उन्हें बेचकर अपना पेट पालने लगा। थोड़े समय में ही चन्दन का सुन्दर उद्यान बगीचा एक वीराना बन गया, जिसमें स्थान-स्थान पर कोयले के ढेर लगे थे। इसमें अब केवल कुछ ही वृक्ष रह गये थे, जो लकड़हारे के लिए छाया का काम देते थे।     ...

आस्था - सत्य घटना

                 आस्था - सत्य घटना 1985-86 में समुद्र के किनारे पर रामायण सीरियल की शूटिंग चल रही थी .. राम की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल एक शिला पर बैठे हुए थे.. समुद्र के पास में ही एक छोटा सा गाँव था, उस गाँव के लोग कभी कभी रामायण की शूटिंग देखने आ जाते थे ... एक दिन उस गाँव में एक बच्चे को सर्प ने डस लिया, बच्चा एक दम बेहोश हो गया और उसके मुँह से सफेद झाग आने लगे ...! जैसे ही उसकी माँ को पता चला, वो अपने बच्चे को गोदी में लेकर वहां दौड़ी जहाँ रामायण की शूटिंग चल रही थी... सभी रामायण की शूटिंग में व्यस्त थे ..महिला रोती रोती एक दम वहाँ पहुँची और जहाँ रामजी ( अरुण गोविल ) बैठे हुए थे...               महिला ने बच्चे को रामजी के चरणों मे पटक दिया और जोर जोर से रोने लगी, रामजी मेरे बच्चे को बचाओ..इसे सर्प ने डस लिया है ..आप भगवान हो, मेरे बच्चे को बचाओ ... प्रभु मेरे बच्चे को बचाओ ... सभी शूटिंग करने वाले हैरान होकर महिला की तरफ देखते रहे, कुछ समय के लिये शूटिंग रोक दी गई .... जब महिला रामजी के सामने ज...

कर्म क्या है?

                          कर्म क्या है? मूल रूप से 'कर्म' को क्रिया' कहते है। यानी शरीर, वाणी और मन से की गयी क्रिया कर्म है। एवं इसी 'क्रिया' रूपी 'कर्म' को ध्यान में रखते हुए शास्त्र, वेद, गीता, पुराण आदि ने कर्म- अकरम, शुभ-अशुभ कर्म, कर्मयोग, कर्म-बंधन आदि की व्याख्या की है। उदाहरण के लिए कर्म-बंधन प्रकरण में राग एवं द्वेष से युक्त 'क्रिया कर्म कहलाते है। अतएव कर्म मन द्वारा होता है, इन्द्रियां केवल साधन है। हाथ-पैर के बिना भी, अगर मन द्वारा कुछ भी अच्छा-बुरा सोचा तो वो भी कर्म है। अस्तु, अब प्रश्न यह है कि कर्म के कितने प्रकार है? ये भाग्य क्या है? कर्म के प्रकार वास्तव में 'कर्म कर्म ही होता है। कर्म के प्रकार नहीं हुआ करते। परन्तु समय के अनुसार अर्थात् भूत एवं वर्तमान के अनुसार - कर्म के प्रकार कहे गए है। इस प्रकार कर्म तीन प्रकार के होते है - 1. संचित कर्म 2. प्रारब्ध कर्म और 3. क्रियमाण कर्म। यह संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म और क्रियमान कर्म का निरूपण हमारे संतों ने अपने ग्रथों में गीता, उपनिषद आदि का प्रमाण देते हुए क...